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जब भी कभी ज़मीर का सौदा हो दोस्तों !! कायम रहो हुसैन के इंकार की तरह !!

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ना जाने क्यों मेरी आंखों में आ गए आंसू !! सिखा रहा था मैं बच्चे को कर्बला लिखना !!

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गरूर टूट गया कोई मर्तबा ना मिला !! सितम के बाद भी !! कुछ हासिल जफ़ा ना मिला !!

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जब भी कभी ज़मीर का सौदा हो दोस्तों !! कायम रहो हुसैन के इंकार की तरह !!

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कत्‍ल-ए-हुसैन असल में मार्ग-ए-यजीद है !! इस्‍लाम ज़‍िंदा होता है हर करबला के बाद !!

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ना पूछ वक़्त की इन बेजुबान किताबों से !! सुनो जब अज़ान तो समझो के हुसैन ज़िंदा है !!

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जन्नत की आरजू में कहा जा रहे है !! लोग जन्नत तो कर्बला में खरीदी हुसैन ने !!

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चाँद निकला जब मोहर्रम का कहीं !! चुप से दश्त-ए-कर्बला रोने लगा !!

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जिक्र-ए-हुसैन आया तो आंखें छलक पड़ी !! पानी को कितना प्यार है अब भी हुसैन से !!

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कर्बला की शहादत इस्लाम बन गई !! खून तो बहा था लेकिन कुर्बानी !! हौसलों की उड़ान दिखा गई !!